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आज से 1000 साल बाद कुछ इस तरह दिखेंगे इंसान!

आज से 1000 साल बाद कुछ इस तरह दिखेंगे इंसान!

बढ़ते पोल्लुशन , बढ़ती मोबाइल रेडिएशन, मिलावटी खाद्य पदार्थ , ख़राब होती जीवनशैली। क्या लगता है आपको इन सारे फैक्टर्स के साथ कैसे आगे बढ़ेगी मानव जाती। हम इंसान जैसे आज दिखते हैं वैसे दिखेंगे आज से 1000 सालों बाद ? कैसा होगा इंसान आज से 1000 सालो बाद ?

क्रमानुगत विकास ह्यूमन एवोलुशन ये एक ऐसा बायोलॉजिकल मैकेनिज्म है जो स्वचालित है आटोमेटिक है। और बाहरी फैक्टर्स बाहरी परिस्थितयों के आधार पर मानव शरीर में बदलाव लाता है। ताकि मानव शरीर बदलते वातावरण के साथ सामंजस्य ताल बिठा सके। एक शब्द में बोले तो सर्वाइव कर सके।

एवोलुशन क्रमानुगत विकास के सबसे बड़े जानकार चार्ल्स डार्विन की माने तो प्रकृति हमेशा ताकतवर को चुनती है। ताकतवर ही ज़िंदा बचता है। यही नियम है। सर्वाइवल फॉर फिटेस्ट। लेकिन लेकिन मानव ने काफी तरक्की की है। साइंस काफी आगे बढ़ चूका है। अब प्रकृति के सामने विज्ञानं खड़ा है। अब सर्वाइवल फॉर फिटेस्ट वाला प्रकृति का बनाया वो नियम उतना कारगर नहीं रहा। क्योंकि अब जब किसी को छोटी बीमारियां छोड़ दीजिये डायबिटीज होती है , लकवा मरता है, हार्ट अटैक होता है। बड़ी से बड़ी बीमारी आती है तो प्रकृति के नियमों के सामने विज्ञानं आ खड़ा होता है। और जान बच जाती है। डायबिटीज वाला भी ज़िंदा बचता है , कमज़ोर इम्यून सिस्टम वाला यानि कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता वाला भी ज़िंदा बचता है और सभी अपने ओफ्फ्सप्रिंग्स यानि की बच्चे पैदा करते है और ह्यूमन जीन पूल में अपना योगदान देते है।

अब बताइये जब ऐसे मानव जीवित बच जाते हैं जिनके genes में वो ताकतवर वाली बात नहीं होती तो अब जो नया जीन पूल बनेगा मानवो का उसमे कमज़ोर और ताक़तवर दोनों किस्म के genes होंगे। केवल ताक़त वॉर नहीं। सरल भाषा में कहें तो प्रकृति का जो फ़िल्टर था बिमारियों वाला जिससे केवल ताक़तवर ही बच पाते थे और उन्ही का वंश बढ़ता था। जिससे स्ट्रांग जीन वाला जीन पूल बनता था। वो तो गया।

 

तो अब आप समझिये क्या ह्यूमन एवोलुशन अब उतनी कारगर साबित होगी ? क्या जो बदलाव होंगे वो बेहतरी के लिए होंगे या आने वाली पीढ़ियों में कमज़ोर गुणसूत्र genes ट्रांसफर किये जाएंगे।

दोस्तों हमने विज्ञान से पिछले 65 सालों में आपनी खुद की औसत आयु तो 20 वर्ष बढ़ा दी है। पर साथ में हमने ये भी पक्का कर दिया है की प्रकृति का नियम Survival for the Fittest अब काम नहीं करेगा अब less fit भी सर्वाइव कर सकेंगे। आपको बता दें की आज के मॉडर्न युग में पर्यावरणीय फैक्टर एनवायर्नमेंटल फैक्टर्स वो ड्राइविंग फाॅर्स वो मुख्या शक्ति नहीं रही जिसकी वजह से ह्यूमन इवॉल्वे करे। आज जो फैक्टर्स ह्यूमन EVOLUTION को ड्राइव कर रहे हैं वो हैं sexual selection . जी हाँ ये सत्य है।

आपको एक उदहारण देते है क्यों महिलाएं है महत्वपूर्ण और उनके सेक्सुअल सिलेक्शन के आधार पर ही ह्यूमन EVOLUTION का अगला चरण टिका हुआ है। इस तथ्य को प्रूफ करने के लिए हम लेंगे नेदरलैंड का उदहारण। वैसे तो औसत हाइट देखी जाए तो पुरे विश्व के मानवो की औसत हाइट बढ़ चुकी है। कारन रहा है नुट्रिशन पोषण। बेहतर पोषण मतलब बेहतर शारीरक ग्रोथ। लेकिन जहाँ पिछले २०० वर्षो के क्रमानुगत विकास के दौरान अमेरिकियों की औसत ऊंचाई 2.9 इंच बढ़ी है वहीँ नीदरलैंड के लोगों की औसत ऊंचाई 7.9 इंच बढ़ी है। अब मज़े की बात ये है की ये कैसे हुआ। तो आपको बता दे ये चमत्कार नेदरलैंड की महिलाओं ने किया। जी हाँ वहां की महिलाओं ने ऊँचे कद के पुरुषों को चुना शादी के लिए। अब उनसे जो बच्चे पैदा हुए उनमे लम्बी ऊंचाई के जीन मौजूद थे। जिसकी वजह से आज नेथरलैंड के पुरुषों की औसत ऊंचाई 6 फ़ीट है। सोचिये औसत ऊंचाई 6 फीट।

बहर हाल आज के परिदृश्य में देखें तो महिलाओं का चयन महत्वपूर्ण है। आज के समय महिलाएं चाहतीं हैं की उनका हस्बैंड इंटेलीजेंट हो और धनी हो पैसे वाला हो। तो सोचिये जो जीन पूल तैयार होगा वो कैसा होगा। बेहतर या ख़राब ?

तो सोच कर देखिये अब जितने youtubers वीडियो बना रहे हैं कैसा दिखेगा इंसान आज से 1000 सालों बाद वो कहाँ तक सहीं है। वो छोड़िये जो 1980 से लेकर सन 2000 तक मान्यता थी की हम मानव आगे जाकर बिलकुल एलियंस की तरह दिखेंगे जिनके सर बड़े होंगे और शरीर पतले दुबले आँखे बड़ी बड़ी क्या ये जो छवि किसी एलियन सरीखे मानव शरीर की बनायीं जाती थी वो सही थी।

आज की वैज्ञानिक तथ्यों पे बात करे तो बिलकुल भी नहीं। हम छोटे नहीं होंगे हम और heighted होते जाएंगे। हमारे शरीर दुर्बल नहीं होंगे ये सशक्त होंगे। और ताक़त वॉर होंगे। कैसे होंगे ये हम आगे बताएँगे। बने रहिये ये एक्सक्यूल्सिवे वीडियो है नॉलेज टीवी का।

2 राहे हैं यहाँ से ह्यूमन ऐवोलुशन की दोनों MANMADE . जी हाँ ये सत्य है। अब जो ह्यूमन EVOLUTION हो रहा है वो मानव निर्मित कारणों से ही हो रहा है। सबूत चाहिए तो इन तथ्यों पर गौर कीजिये। आज से 10,000 साल पहले हमारे अमाशय से STOMACH से एक तय उम्र के बाद १-३ साल के बाद दूध को पचाने वाले एंजाइम सीक्रेट ही नहीं होते थे स्त्राव ही नहीं होता था उनका। मतलब आज से 10,000 पहले हम मानव दूध नहीं पचा पाते थे।

१०,000 साल पहले खेती आती नहीं थी या आती भी थी तो उस वक़्त उतनी परिष्कृत नहीं थी की भरण पोषण हो सके तो कुपोषण से मौते ज़यादा होती थी। फिर अचानक आज से 10000 साल पहले ही किसी मनुष्य की जीन में म्युटेशन हुआ। जो एंजाइम दूध को पचने के काम में आता था वो उम्र के ३सरे साल के बाद भी जारी रहा उस मानव में। तो फिर क्या था उस मानव ने दूध से ही नुट्रिशन लेना शुरू कर दिया। ज़िंदा रहा सर्वाइवल फॉर फिटेस्ट बच्चे पैदा किया वंश बढ़ाया और आज हम सब दूध को पचने में सक्षम हैं। सोच के देखिये वो पूरी मानव जो दूध न पचा पाते थे उनका वंश दूध पचा पाने वाले म्युटेंट मानवों ने REPLACE कर दिया। समझे आप। दूध उस वक़्त फसलों से ज़्यादा आसान जरिया था। नुट्रिशन का। तो मानवों ने वही किया। मानव आज से 10000 साल पहले LACTOCE इन्टॉलरेंट से LACTOCE TOLERANT बन गया। और वो जीन पुरे ह्यूमन जीन पूल में डिस्ट्रीब्यूट हो गया।

अब आते है फिर से मॉडर्न डे ह्यूमन EVOLUTION के 2 मुख्या मैन मेड फैक्टर्स पे। एक है मानव मशीन हाइब्रिड का कांसेप्ट आप इसे साईबोर्ग कांसेप्ट कह सकते हैं। और एक है जेनेटिक इंजीनियरिंग।

अब एक और भ्रान्ति है आज कल के लेस्स अवेयर ऑनलाइन यूज़र्स में की एक दिन हम सब साईबोर्ग बन जायेंगे। इसके लिए जो सही शब्द है वो है transhumanism . तो आपको बता दे ये नहीं होने वाला। कुछ हद तक तो होगा। लेकिन ये वैसा ही है जैसे नयी टेक्नोलॉजी के आने से पुरानी टेक्नोलॉजी बदल जाती है। मानवो में से अभी ही कई लोग हाफ ह्यूमन हाफ मशीन की परिभाषा में खरे उतरतें हैं। आप हार्ट में लगने वाले पेस मेकर या टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले रोडस एंड प्लेट्स को क्या कहेंगे। आखिर वो भी तो मैकेनिकल पार्टस है।

बाते खूब होती हैं ऑनलाइन जगत में की अब मैकेनिकल हार्ट बनेगा बीओनिक आँखे बनेंगी जो और भी प्रकार के प्रकश की ववलेंग्थ्स को देख सकेंगी। etc etc etc . एक बार आप किसी अपने आस पास के शख्स से पूंछे जिसे हाथ या पेअर में रोड या प्लेट लगे हों। वो आपको बोलेगा इससे बुरा कुछ भी नहीं। जी हाँ बॉडी का बाहरी नॉन बायोलॉजिकल धातुओं संग ताल मेल बैठता नहीं है। ये एक सत्य है। तो मेडिकल साइंस कभी भी नहीं चाहेगा की टूटे हुए हाथ को एक मैकेनिकल हाथ से चेंज किया जाए जो इंसानी टच फील और एक पुरे ओवरआल फीलिंग तो ही नहीं एक्सेप्ट कर सकता।

देखिये हुमंस अगर बेहतर होंगे या ये कहें की वो MANMADE फैक्टर जो सबसे अधिक या बेहतर तरीके से ह्यूमन EVOLUTION को प्रोपेल करेगा आगे बढ़ाएगा वो है जेनेटिक इंजीनियरिंग , स्टेम सेल्ल ट्रांसफर , बायोलॉजिकल सिंथेसिस ऑफ़ ह्यूमन ऑर्गन्स। ये सारा कुछ होने वाला है बहुत जल्द। शायद साईबोर्ग टेक्नोलॉजी से पहले। वैज्ञानिक तो DNA कम्प्यूटर्स बनाने के लेवल तक आगे बढ़ चुके हैं जिसमे सिलिकॉन चिप्स की जगह DNA , बायोकेमिस्ट्री और मॉलिक्यूलर बायोलॉजी इस्तेमाल होने वाली है। मान के चलिए की एक डीएनए कंप्यूटर मानव मस्तिष्क की तरह ही होगा।

बहरहाल जीन एडिटिंग जिसके माध्यम से बीमारी के जीन हटा दिए जायेंगे और शक्तिशाली GENES को गुण सूत्र में ऐड कर दिया जायेगा इससे जो जीन पूल बनेगा वो एक आदर्श शक्ति शाली मानव का बनेगा। ये मानव किसी भी लेवल पर मशीनी मानवो रोबोट्स या CYBORGS से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली होगा। हो सकता है की आने वाले समय में जब जीन एडिटिंग बेहद परिष्कृत और दुनिया भर की सरकारों द्वारा मान्यता प्राप्त हो जाएगी तो हो सकता है। मानव GENES में दूसरे जीवों के GENES के गुण भी लिए जाए। आपने कभी axolotl के बारे में सुना है ये वो जिव है जो अपनी लिम्बस यानि बाहें अपना दिल हार्ट यहाँ तक की अपना पूरा नर्वस सिस्टम यानि की ब्रेन भी पूरी तरह कट जाने पर या क्षति ग्रस्त होने पर REGENERATE कर सकता है। यानि की फिर से ऊगा सकता है। सोच के देखिये अगर axolotl को ये शक्तियां देने वाले GENES मानवो में काम करने लगें तो क्या होगा। एक सुपर ह्यूमन का जनम होगा। और एक दिन ये होगा।

और जब जेनेटिक इंजीनियरिंग की शक्तियों को अपनी नॉलेज और ज्ञान से मानव साध लेगा। तभी वह अंतरिक्ष की तरफ देख सकता है। अन्यथा उसके पहले इंटरप्लेनेटरी यात्रायें न सफल होंगे न ही हम सफल कॉलोनीज दूसरे किसी गृह पर बसा पाएंगे. जेनेटिक इंजीनियर और नैनोटेक के माध्यम से ही हमें एक्सट्रीम कंडीशंस में जीवित रहने की काबिलियत मिल सकती है। और यही सही मायनो में ह्यूमन एवोलुशन होगा।

पर अफ़सोस दोस्तों की दुनिया भर की सरकारें आज अपने आप को एक दूसरे से बेहतर बनाने में संघर्ष कर रही हैं। मानवता एक हो कर नहीं चल रही है। हर देश चाहता है की वो दूसरे देश से शक्तिशाली बन जाए। दुःख की बात तो ये है की हर देश के नागरिक भी यही चाहते हैं की उनका देश सबसे बेहतर हो। ये सोच हमारे नेताओं को सुरक्षा और मिलिट्री पर खर्च करने के लिए प्रेरित करती है दोस्तों। जिस खर्च से विज्ञानं मानवता के लिए अभूतपूर्व खोजे कर सकता है मानव जाती को और सशक्त बना सकता है वो विज्ञानं को मिल ही नहीं पाटा। दुनिया की सारी सरकारें जितना खर्च हथियार खरीदने पे करती है उसका १० प्रतिशत भी शोधो अनुसंधानों को अगर दिया जाए तो मानवता कहाँ की कहाँ निकल सकती है। अब वक़्त आ गया है की हमें जाती धर्म क्षेत्रीयता से बढ़ कर मानव जाती के रूप में सोचना चाहिये। यकीं मानिये दोस्तों भारत माता के कांसेप्ट से कहीं ज़्यादा ताकतवर है धरती माता का कांसेप्ट। हम मानव इस बात को जितनी जल्दी समझ जाए उतना बेहतर। नहीं तो हम सिर्फ शारीरक रूप से इवॉल्वे होंगे मानसिक रूप से नहीं।

बहर हाल 1000 वर्ष पूरी मानव जाती की TIMELINE में चुटकी बजाने जितना समय ही है। हम जैसे छोटे लोग ये नहीं तय कर सकते की मानव का भविष्य आज से 1000 साल बाद कैसा होगा। पर इतना जानते हैं अगर हम आपस में लडे नहीं तो एक दिन हम ज़रूर टाइप 5 सिविलाइज़ेशन बन जायेंगे। अब ये टाइप 5 सिविलाइज़ेशन का क्या कांसेप्ट है ये समझने के लिए आपको ढेर सारे कमेंट करने होंगे इस विषय पर चर्चा करनी होगी तो शायद अगला टॉपिक यही हो। चलते हैं धन्यवाद्।

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